Milestone's Literature

जनवरी 3, 2013

सावित्रीबाई :देश की पहली महिला अध्यापिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता

Filed under: Women's Day — Milestone Education Society (Regd.) Pehowa @ 7:52 पूर्वाह्न
46427_447925685260932_316535136_n
सावित्रीबाई फुले के जन्मदिवस 3 जनवरी  पर विशेष भारतीय स्त्री मुक्ति दिवस देश की पहली महिला अध्यापिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता. एक ऐसी महिला जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह जैसी कुरीतियां के विरूद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया. पर उसे हिंदुस्तान ने भुला दिया. ऐसी महिला को हमारा शत-२ नमन… ——————————————————-…—————- सावित्री बाई फुले का जन्म सन् 1831 में महाराष्ट्र के धनक वाणी गांव में हुआ. उनके पिता का नाम खांडोजी पाटिल था और मां का नाम लक्ष्मी था. जब सावित्रीबाई 9 वर्ष की थी तो 13 वर्षीय ज्योबिता फुले के साथ 1848 में उनकी शादी हो गई थी. उस वक्त फुले दलितों एवं शूद्रों के बीच शिक्षा के प्रचार-प्रसार में व्यस्त थे. वह समय दलितों और स्त्रियों के लिए नैराश्य और अंधकार का समय था. समाज में अनेक कुरीतियां फैली हुई थीं और नारी शिक्षा का प्रचलन नहीं था.
विवाह के समय तक सावित्री बाई फुले की स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी और ज्योतिबा फुले तीसरी कक्षा तक पढ़े थे. लेकिन उनके मन में सामाजिक परिवर्तन की तीव्र इच्छा थी. इसलिये इस दिशा में समाज सेवा का जो पहला काम उन्होंने प्रारंभ किया, वह था अपनी पत्नी सावित्रीबाई को शिक्षित करना. सावित्रीबाई की भी बचपन से शिक्षा में रुचि थी और उनकी ग्राह्य शक्ति तेज़ थी. उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन का प्रशिक्षण लिया. सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने इसके बाद अपना ध्यान समाज-सेवा की ओर केन्द्रित किया. 1 जनवरी सन 1848 को उन्होंने पूना के बुधवारा पेठ में पहला बालिका विद्यालय खोला. फुले का मानना था कि अगर परिवार की मुखिया स्त्री शिक्षित है, तो समझो उस परिवार के सभी सदस्य ज्ञान युक्त, शीलवान और संस्कार शील होंगे, बुद्धिमान होंगे. लेकिन जब उन्होंने स्कूल खोला तो उन्हें महिला शिक्षिका की जरूरत महसूस होने लगी. इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ाने का निर्णय लिया. उन्होंने सर्वप्रथम अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षा दी. इस तरफ सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम प्रौढ़ शिक्षित महिला के रूप में भी जानी जाती है. सावित्रीबाई फुले इस स्कूल का प्रधानाध्यापिका बनीं. इसी वर्ष उस्मान शेख के बाड़े में प्रौढ़-शिक्षा के लिए एक दूसरा स्कूल खोला गया. दोनों संस्थाएं अच्छी चल निकलीं. दबी-पिछड़ी जातियों के बच्चे, विशेषरूप से लड़कियां बड़ी संख्या में इन पाठशालाओं में आने लगीं. इससे उत्साहित होकर देख ज्योतिबा दम्पति ने अगले 4 वर्षों में ऐसे ही 18 स्कूल विभिन्न स्थानों में खोले.
सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने अब अपना ध्यान बाल-विधवा और बाल-हत्या पर केन्द्रित किया. उन्होंने विधवा विवाह की परंपरा प्रारंभ की और 29 जून 1853 में बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह की स्थापना की. इसमें विधवाएं अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और यदि शिशु को अपने साथ न रख सकें तो उन्हें यहीं छोड़कर भी जा सकती थीं. इस अनाथालय की सम्पूर्ण व्यवस्था सावित्रीबाई फुले सम्भालती थी और बच्चों का पालन पोषण मां की तरह करती थीं. उनका ध्यान खेत-खलिहानों में काम करने वाले अशिक्षित मजदूरों की ओर भी गया. 1855 में ऐसे मजदूरों के लिए फुले दंपत्ति ने रात्रि-पाठशाला खोली. उस समय अस्पृश्य जातियों के लोग सार्वजानिक कुएं से पानी नहीं भर सकते थे. इसको देखते हुए 1868 फुले दंपत्ति ने  उनके लिए अपने घर का कुआं खोल दिया. इधर, ज्योतिबा फुले के पिता गोविंदराव फुले परंपरावादी होने के कारण अपने पुत्र के कार्यो से बहुत मुसीबत में थे. उन्हें तब ज्यादा दुख हुआ जब ज्योतिबा फुले ने सावित्रीबाई की शिक्षा के महत्व के बारे में अपने पिता से तर्क किया, परंतु कोई लाभ नहीं हुआ. गोविंदराव ने अत्यधिक क्रोध में अपने पुत्र ज्योतिबा व पुत्रवधु सावित्रीबाई को घर छोड़ने का आदेश दिया. सावित्रीबाई इस मुसीबत में अपने पति के साथ ही रही. दोनों ने घर छोड़ दिया, परंतु अपना अध्ययन कार्य जारी रखा. यह उस वक्त की बात है जब महिलाओं को चप्पल पहनने या छाता इस्तेमाल करने अथवा अपने बड़ों की मौजूदगी में अपने पति से बात करने की अनुमति तक नहीं थी. महिलाओं को शिक्षा देना घर में आग लगाने के समान समझा जाता था.
ज्योतिबा-दम्पति संतानहीन थे. उन्होंने 1874 में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राह्मणी के नाजायज बच्चे को गोद लिया. यशवंतराव फुले नाम से यह बच्चा पढ़लिखकर डाक्टर बना और आगे चलकर फुले दम्पति का वारिस भी. 28 नवंबर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई ने बड़ी मजबूती के साथ इस आन्दोलन की जिम्मेदारी सम्भाली और सासवड, महाराष्ट्र के सत्य-शोधक समाज के अधिवेशन में ऐसा भाषण दिया जिसने दबे-पिछड़े लोगों में आत्म-सम्मान की भावना भर दी. सावित्रीबाई का दिया गया यह भाषण उनके प्रखर क्रन्तिकारी और विचार-प्रवर्तक होने का परिचय देता है. सावित्रीबाई प्रतिभाशाली कवियित्री भी थीं. इनके कविताओं में सामाजिक जन-चेतना की आवाज पुरजोर शब्दों में मिलाती है. उनका पहला कविता-संग्रह सन 1854 में ‘काव्य फुले’ नाम से प्रकाशित हुआ और दूसरी पुस्तक ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ शीर्षक से सन 1882 में प्रकाशित हुआ.
सावित्रीबाई फुले का जीवन कई दशकों से महाराष्ट्र के गांव कस्बों की औरतों के लिए प्रेरणादायक रहा है. उनकी जीवनी एक औरत के जीवट औेर मनोबल को समर्पित है. सावित्रीबाई फुले के कार्यक्षेत्र और तमाम विरोध और बाधाओं के बावजूद अपने संघर्ष में डटे रहने के उनके धैर्य और आत्मविश्वास ने भारतीय समाज में स्त्रियों की शिक्षा की अलख जगाने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे प्रतिभाशाली कवयित्री, आदर्श अध्यापिका, निस्वार्थ समाजसेविका और सत्य-शोधक समाज की कुशल नेतृत्व करने वाली महान नेता थीं. – अशोक दास (संपादक) दलित दस्तक/ www.dalitmat.com

1 टिप्पणी »

  1. Dhanyavaad

    टिप्पणी द्वारा harjinder kumar — जनवरी 11, 2013 @ 3:08 अपराह्न | प्रतिक्रिया


RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: